आज के दिन को ईरान में "रोज़े तबीअत" या "सीज़दा बेदर" के नाम से भी जाना जाता है।
कार्यक्रम में हम ईरान के एक अति प्राचीन उत्सव के बारे में वार्ता करेंगे जिसका संबन्ध प्रकृति से है। पूरे संसार में यह बात प्राचीनकाल से प्रचलित रही है कि दुनिया के विभिन्न राष्ट्र, अपने राष्ट्रीय एवं धार्मिक पर्वों पर भांति-भांति के उत्सवों का आयोजन करते हैं। राष्ट्रों के यह त्योहार लोगों के बीच सौहार्द एवं बंधुत्व के बढ़ने का कारण भी बनते हैं। ईरान में भी अलग-अलग अवसरों पर धार्मिक एवं राष्ट्रीय उत्सव मनाए जाते हैं। ईरान के राष्ट्रीय उत्सवों में से एक नौरोज़ है जो इस देश की एक सांस्कृतिक परंपरा है। इसी नौरोज़ के उत्सवों में एक उत्सव सीज़दा बेदर या प्राकृति दिवस है। यह उत्सव या त्योहार नौरोज़ के उत्सवों का अन्तिम उत्सव माना जाता है।
ईदे नौरोज़ या ईरानी नववर्ष से संबन्धित पर्व ईरान का एक अत्यंत प्राचीन पर्व है। यह भलाई, पवित्रता, सच्चाई और प्रेम का सूचक है। यह पर्व लगभग तीन हज़ार वर्ष से अधिक समय से मनाया जा रहा है। यह ईरान की संस्कृति व सभ्यता को प्रतिबिंबत करता है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह लोगों की संयुक्त मान्यताओं को दर्शाता है। भौगोलिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो नौरोज़ शताब्दियों से चीन से लेकर भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों तक मनाया जाता रहा है। समय बीतने के साथ ही साथ इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विचार और संस्कार भी शामिल होते गए। यद्यपि आज नौरोज़ के संस्कार इस व्यापक भौगोलिक क्षेत्र के हर स्थान पर अलग-अलग रूप धारण कर चुके हैं लेकिन उनका मूल ईरानी स्वरूप अब भी सुरक्षित है। 13 फरवरदीन को मनाया जाने वाला प्राकृति दिवस इन उतस्वों का अन्तिम उत्सव माना जाता है। लिखित ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर 13 फ़रवरदीन, प्रकृति और उसमें छिपी अनुकंपाओं एवं विभूतियों के सम्मान का भी दिन है। प्राचीन काल से ईरानी, नववर्ष के आरंभिक 12 दिनों को साल के 12 महीनों के रूप में याद याद करते आए हैं। इस प्रकार 13 फ़रवरदीन को यह सारे उत्सव समाप्त होते थे। आज के दिन ईरानी, बाग़ों और जंगलों में जाकर जश्न मनाते थे। अगले दिन अर्थात 14 फ़रवरदीन से वे विगत की भांति सामान्य रूप में अपना दैनिक जीवन व्यतीत करना आरंभ करते थे।